विज्ञापन

ऐसे भी

Preeti Rawat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसे भी कुछ मौसम आए,
        
                                                    
                            
जहाँ धूप भी साया बन जाए,
रौशनी भी जैसे थक सी जाए,
और ख़ामोशी सब कुछ कह जाए।

ऐसे भी कुछ चेहरे देखे,
जिन्हें देख के आँखे भर आएं,
मगर होंठ मुस्कुराहट ओढ़ें,
कि दर्द कोई पढ़ ना पाए।

ऐसे भी कुछ लम्हें गुज़रे,
जो वक़्त से चुरा के रख लिए,
बोल तो ना सके उनसे कुछ,
पर हर रोज़ दिल में कह लिए।

ऐसे भी कुछ ख्वाब बुने थे,
जिनमें सिर्फ़ 'हम' ही होते थे,
नींदें छूटी, मगर ख्वाब रहे,
किसी याद के जैसे सोते थे।

ऐसे भी कुछ खत लिखे थे,
जो कभी भेजे ही नहीं गए,
क्योंकि डर था कि जवाब ना आए,
या शायद जवाब में ख़ामोशी आए।

ऐसे भी कुछ रास्ते देखे,
जो मंज़िल तक ना जाते थे,
पर चलने से सुकून मिलता था,
शायद वो रास्ते दिल से आते थे।

ऐसे भी कुछ रिश्ते होते हैं,
जो नाम नहीं पाते ज़माने में,
मगर उनकी गहराई ऐसी होती है,
कि उम्रें बीत जाती हैं निभाने में।

ऐसे भी कुछ लोग मिलते हैं,
जिनसे बिछड़कर भी साथ रहते हैं,
वो दुआ बन जाते हैं सांसों में,
और याद बनकर दिल में बहते हैं।

ऐसे भी कुछ प्यार होते हैं,
जो इज़हार नहीं मांगते,
बस चुपचाप सब कुछ दे जाते हैं,
और कुछ ना लेकर लौट जाते हैं...


 
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all