प्रभात की पहली किरण धरा से कुछ यूं टकराई
नव जीव का स्पंदन लेकर देवदूत बनकर आई।
पर्वत शिखरों पर लालिमा फैलाकर
लता वितान में खुशबू भर लाई।
अलसाई भ्रमरों की तन्द्रा पर बाण चलाकर
पुष्पों की कैद से आजाद कर लाई।
बैलों की घंटी की मधुर धुन सुना कर
कृषक नौनिहालों की निंद्रा तोड़ने आई।
फसलों पर पड़े ओस की बूंदों को
लाल किरणे मोती सा चमकाने आई।
रात से सुनी पगडंडी पे कोलाहल का आगाज कर
एक उम्मीद सभी के मन भर लाई।
कल कल करती सरिता के तट पर
पनिहारिन के पायल की झंकार सुनाई।
सुदूर मंदिर के घंटी की मधुर ध्वनि सुन
जीवन में उल्लास की तरंगें भर लाई।