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माँ की ममता का कोई मोल नहीं होता

Praveen Roy

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ की ममता का कोई मोल नहीं होता
        
                                                    
                            
पिता के फ़र्ज़ का कोई तोल नहीं होता।

महज इतना समझने में जीवन के कई वर्ष गँवा दिये
पिता की अर्जित संपत्ति को बिना सोचे लूटा दिए।

बात अपनी पर आई तो जाने कितने व्याख्यान गढ़ दिए,
एक एक वस्तु पर अपनी पसीने की लकीरें गिना दिए।

समय की परिभाषा क्या हैं, वक़्त को समझने लग गए
खुद के बनाए उसूलों पर तारीफों के पुल बांध दिए।

दो पैसे क्या कमाए! अपनों को पहचानना भूल गये
माता पीठ के दिए संस्कारों को मानने से मुकर गए।

समय का चक्र अपने आप को दोहरा दिया
अपनी हीं औलाद ने आँखों को आईना दिखा दिया।

बचपन के आईने में जब खुद को देर तक निहारा
अपने हीं कर्मों की तुला पर जब खुद को परखा।

अपना खुद का अतीत सामने सवाल बनकर खड़ा था
खुद के हीं सवालों के जाल में मैं उलझ हुआ था।

काश मैं भी ममता का कुछ मोल चुकाया होता
पिता के फ़र्ज़ का कुछ तोल चुकाया होता।

कुछ तोल चुकाया होता!
3 महीने पहले
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