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मेरी बहना की मुस्कान

Prateet Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुबह की खिलती पहली किरण हो जैसे ।
        
                                                    
                            
शरद ऋतु में घास पर रखी ओस की बूंद हो जैसे।
ढलती शाम की लालिमामय मेघ हो जैसे ।
ओ! बहना मेरी,
प्रकृति का यह सभी दृश्यम छिपा तेरी मुस्कुराहट में हो जैसे ।
जिसे देख तेरे भाई का मन करता हो वैसे।
बगीचे में खिले फूल से महकता हो बगीचा जैसे ।
गिरते झरने की आनंद धारा बहती हो जैसे ।
हिम शिखरों से बढ़ता प्रकृति सौंदर्य हो जैसे ।
और , आखिर में मैं यही कहते जाता हूं ।
मुस्कुराहट तेरी सदा यूं ही चेहरे पर बनी रहे।
दुःख की छाया कोसो तुझसे दूर बनी रहे.....।
 
एक महीने पहले
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