बेटियों का भी एक जीवन है,
उनके भी सुनहरे सपने हैं,
बेटियां भी आकांक्षाएं रखती हैं मन में,
फिर क्यूँ परिवार और समाज में बेटियां,
उपेक्षित रहती हैं,उनको अनदेखा किया जाता है.
हमारे समाज ने,परिवार ने बेटियों का जीवन,
अधिकांशतः एक भेड़चाल में बांध दिया है,
समाज और रिश्तेदार क्या कहेंगे,एक पिता,
आँख मूंद कर सामाजिक अपेक्षाओं के लिए,
बेटी का विवाह करने को ही प्राथमिकता देता है.
गरीबी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण,
बेटियां थोड़ा बहुत पढ़ कर घर बैठ जाती हैं,
देश की 80% आबादी गांवों या कस्बों में रहती है,
ज्यादातर बेटियां उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं,
उन्हें विवाह और मातृत्व की भूमिकाओं तक,
सीमित कर दिया जाता है....