यह जनवरी का जश्न हमें स्वीकार नहीं,
यह केवल कैलेंडर की बदली हुई दीवार है।
हमारा नववर्ष तो तब आता है,
जब प्रकृति खुद श्रृंगार है।
जब पलाश फूलों से दहक उठता,
कोयल फिर से गीत सुनाती है,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की भोर
जीवन में नव चेतना लाती है।
हमारा साल शुरू होता है
नवरात्रि की पावन आरती से,
जब धरती माँ मुस्काती है
अन्न, जल और संस्कृति से।
यह नया साल नहीं, जो ठंड में आए,
जहाँ न खेत जागें, न त्यौहार हों,
नववर्ष वही जो ऋतु संग चले,
जहाँ परंपरा और संस्कार हों।
हिंदू धर्म ने समय सिखाया,
प्रकृति से जोड़कर जीवन का ज्ञान,
इसलिए चैत्र से शुरू हुआ
हमारा सच्चा नववर्ष महान।
ना विरोध, ना किसी से बैर,
बस अपनी पहचान की बात कहें,
हम हिंदू हैं, यह गर्व से बोलें,
चैत्र से नववर्ष मनाएँ।
- प्रशान्त रस्तोगी