विज्ञापन

बेरोज़गार का दर्द

Prashant Rastogi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेरोज़गार का दर्द
        
                                                    
                            

डिग्रियाँ हाथों में लेकर, दर-दर भटकता देखा है,
सपनों को आँखों में रखकर, खुद को थकता देखा है।

कभी पिता की उम्मीदों को, चुपचाप सहते देखा है,
कभी माँ की आँखों में मैंने, अपना दर्द कहते देखा है।

मेहनत में कोई कमी नहीं, फिर भी मंज़िल दूर खड़ी,
किस्मत की इन राहों पर, हर उम्मीद है जैसे अड़ी।

कभी नौकरी की आस में, दिन-रात गुज़रते देखे हैं,
कभी छोटे-छोटे सपनों को, आँखों से उतरते देखे हैं।

पर हार मानना सीखा नहीं, तूफ़ानों से लड़ना आता है,
गिरकर फिर से उठ जाना ही, जीवन हमें सिखाता है।

कल मेरा भी सूरज निकलेगा, ये विश्वास बचा रखा है,
अँधियारे के इस दौर में भी, उम्मीदों को जगा रखा है।

नाम मेरा प्रशांत है, संघर्षों से घबराऊँगा नहीं,
वक़्त भले कितना भी लगे, अपने सपनों से हारूँगा नहीं।
7 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pandit Chandradutt

2866 कविताएं

View Profile

Rajani Shakyawar

54 कविताएं

View Profile

TATA VENKAT SRINIVAS

24 कविताएं

View Profile