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बेरोज़गार का दर्द

Prashant Rastogi

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                            बेरोज़गार का दर्द
        
                                                    
                            

डिग्रियाँ हाथों में लेकर, दर-दर भटकता देखा है,
सपनों को आँखों में रखकर, खुद को थकता देखा है।

कभी पिता की उम्मीदों को, चुपचाप सहते देखा है,
कभी माँ की आँखों में मैंने, अपना दर्द कहते देखा है।

मेहनत में कोई कमी नहीं, फिर भी मंज़िल दूर खड़ी,
किस्मत की इन राहों पर, हर उम्मीद है जैसे अड़ी।

कभी नौकरी की आस में, दिन-रात गुज़रते देखे हैं,
कभी छोटे-छोटे सपनों को, आँखों से उतरते देखे हैं।

पर हार मानना सीखा नहीं, तूफ़ानों से लड़ना आता है,
गिरकर फिर से उठ जाना ही, जीवन हमें सिखाता है।

कल मेरा भी सूरज निकलेगा, ये विश्वास बचा रखा है,
अँधियारे के इस दौर में भी, उम्मीदों को जगा रखा है।

नाम मेरा प्रशांत है, संघर्षों से घबराऊँगा नहीं,
वक़्त भले कितना भी लगे, अपने सपनों से हारूँगा नहीं।
2 महीने पहले
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