ज़िन्दगी एक पेशा है,
और इंसान एक समान,
जो करता है खुद की रोज़ नुमाइश,
कहीं हुस्न की,
तो कहीं इश्क़ की,
कहीँंशख्सियत बिकती है,
तो कहीं मोहब्बत खरीदी जाती है,
ना वफ़ा का ज़िक्र होता है, ना दुआ का,
ना इंसानियत को तवज्जु मिलती है,
ना ही कोई मददगार तारीफ़ पाता है,
मज़हब की ज़ुबान को भी मैला कर दिया,
रिश्तों का भी वजूद धुंधला कर दिया,
दलालों की कमी नहीं इस जहान में,
रोज़ बाज़ार लगता है झूठ का, फ़रेब का,
बोलियाँ लगाई जाती है,
जो ज़्यादा कीमत अदा करदे,
वही कामरान कहलाता है,
बस यूँही नुमाइश चलती रहती है,
ज़िन्दगी के पेशे में,
और इंसान एक सामान बनके रह जाता है
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