एक बूँद संजोई मैंने,
जो नैन के सिरे से,
पलकों पर उतरी थी,
और आकर बैठ गई वो,
मेरी ऊँगली की नोक पर,
कुछ देर टिकी रही वहीं,
फ़िर बिखरी और फ़ैल गई,
खोकर अपना अस्तित्व,
रह गई बस वो पानी,
मगर उसकी स्मृति रही हमेशा,
नैनों में,
पलकों में,
और ऊँगली की उस नोक पर भी |
पावन प्रेम की तरह,
जो मिलता क्षण भर के लिए,
मगर रहता सदा के लिए,
इस हृदय में,
इस मन में,
इस देह के अस्तित्व से परे,
इस रूह में |
- प्रदीप्ति