तुम मुझे ढूंढ़ना चाहते हो,
समझना चाहते हो,
तो यूँही बैठे मत रहो,
जाओ उस कमरे में,
और ढूंढो मुझे,
मेरी किसी नज़्म में,
उनके शब्दों में,
उन अधूरी पंक्तियों में भी,
और
तुम पाओगे मुझे,
स्याही के उन बिखरे धब्बों में भी,
उन कटे पिटे शब्दों में,
उन सिकुड़े फटे पन्नों में भी |
तुम पाओगे मुझे,
हर विराम और अल्पविराम की,
बदलती ख़ामोशी में,
और
शब्दों में छिपी उस आवाज़ में,
जो कभी फुसफुसाती है,
कभी खिलखिलाती है,
कभी सिसकती है,
कभी चिल्लाती है |
उन आवाज़ों में ढूंढो मुझे,
और उनमें छिपी ख्वाहिशें को,
कुछ गिले शिकवे,
कुछ रंजिशें,
कुछ परेशानियाँ,
कुछ नादानियाँ |
ढूंढना है तो ऐसे ढूंढो मुझे |
अगर समंदर में तैरने से झिझकते हो,
या डूबने से डरते हो,
तो मत ढूंढो मुझे कभी,
तट पर यूँ खड़े रहकर,
सौगात में तुम,
सिर्फ़ ये टूटी लहरें ही पाओगे |
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