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हर सितम नाज़ नख़रा उठाना पड़ा जब हबीबो को उल्फ़त सिखाना पड़ा

Pradeep Tiwari'Deep'

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर सितम नाज़ नख़रा उठाना पड़ा
        
                                                    
                            
जब हबीबो को उल्फ़त सिखाना पड़ा

रोना चाहा मगर मुस्कुराना पड़ा
दिल के नाले को दिल में छुपाना पड़ा

इश्क़ में हमने बेले है पापड़ बहुत
गीत उल्फ़त का मर-मर के गाना पड़ा

दिल की सरहद पे हर जंग लड़नी पड़ी
हार कर क़ैद में तेरी आना पड़ा

इन निगाहों से बचना है मुश्किल बहुत
दिल ज़िगर जान सब कुछ गवाना पड़ा

ख़त तुझे जो लिखे थे कभी प्यार से
आज़ दरिया में उनको बहाना पड़ा

भाप पानी हुआ ख़त की तासीर से
ग़म की बारिश में फिर भीग जाना पड़ा

दर्द-ए-उल्फ़त को दिल में छिपाए हुए
राब्ता फिर क़लम से बनाना पड़ा

'दीप' दीवानो का हाल मत पुछिए
आशियॉं हसरतों का जलाना पड़ा
-प्रदीप_तिवारी 'दीप'
 
एक महीने पहले
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