हर सितम नाज़ नख़रा उठाना पड़ा
जब हबीबो को उल्फ़त सिखाना पड़ा
रोना चाहा मगर मुस्कुराना पड़ा
दिल के नाले को दिल में छुपाना पड़ा
इश्क़ में हमने बेले है पापड़ बहुत
गीत उल्फ़त का मर-मर के गाना पड़ा
दिल की सरहद पे हर जंग लड़नी पड़ी
हार कर क़ैद में तेरी आना पड़ा
इन निगाहों से बचना है मुश्किल बहुत
दिल ज़िगर जान सब कुछ गवाना पड़ा
ख़त तुझे जो लिखे थे कभी प्यार से
आज़ दरिया में उनको बहाना पड़ा
भाप पानी हुआ ख़त की तासीर से
ग़म की बारिश में फिर भीग जाना पड़ा
दर्द-ए-उल्फ़त को दिल में छिपाए हुए
राब्ता फिर क़लम से बनाना पड़ा
'दीप' दीवानो का हाल मत पुछिए
आशियॉं हसरतों का जलाना पड़ा
-प्रदीप_तिवारी 'दीप'
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