कोई दोराय नहीं
इसमें
कि अपूर्णता ही
इस निखिल ब्रह्मांड
की है पूर्णता
यह दार्शनिक उक्ति
डाल सकती है संदेह में
नमी-गिरामी
और पहुंचे हुए
विद्वानों को भी
लेकिन है यह
एकदम सत्य
अगर इस ब्रह्मांड में
नहीं होती अपूर्णता
तो संभव नहीं था
विकास
किसी किस्म का भी
क्योंकि अपूर्णता ही है
विकास की जननी
इसलिए अपूर्णता को
कमी न मानकर
लेना चाहिए
हम सबको उसे
एक महान
प्रेरक शक्ति के रूप में
क्योंकि पूर्णता के बाद तो
लग जाता है विराम
जबकि अपूर्णता में
चलता रहता काम
अविराम।