भाग्य भी खिलाती है
न जाने क्या-क्या खेल
कि चकरा कर रह जाता है
बेचारा इंसान
पर बदा है जो भाग्य में
वह तो पड़ता ही है
झेलना इंसान को
कभी कमरे की दीवार पर
टंगी घड़ी
रुक जाती है
चलते-चलते अचानक
तो कई महीनों तक
रुकी रहती है वह
यूं ही
फिर जब पड़ती है
घडी की रुकी हुई सुई पर
नज़र एक दिन
तो अचानक हो जाता मन
बंद घडी को चलाने का
ऐसे में तब दोबारा से
चल पड़ती है घडी
रुकी हुई घडी के साथ
मानो तब चल पड़ती है
रुकी हई सुई भाग्य की
क्या बनेगी प्रतीक यह
किसी सौभाग्य की।
-डॉ. प्रदीप कुमार मुख़र्जी