आधे-अधूरे विचारों से
बनती नहीं है
कभी कविता
किसी एक भाव को
पकड़कर
बुनना पड़ता है उसमें
मानीखेज ताना-बाना
तभी निर्णायक मोड़
पर पहुंचंकर
होती है कविता पूरी
तब आधा-अधूरा विचार
पहुंच कर
अपने अंजाम तक
होता है सार्थक रूप से
अभिव्यक्त अपने
पूर्णता को प्राप्त अपने।