जो मिला है
उसके लिए होना चाहिए
मन में अहोभाव
असल में
आत्मसंतुष्टि से ही
उपजता है अहोभाव
जबकि असंतुष्टि से
होता है पैदा
अहंकार
जो नहीं है
उसी के बारे में सोचते रहने से
होता है मन बेचैन
जबकि जो है पास
उसके एहसास से
होता है पैदा
मन में अहोभाव
अहोभाव से
लगते हैं पंख
अहोभाग्य के
जिससे खुलता है
उन्नति का पथ
जबकि अहंकार से
गिरना पड़ता है
घोर पतन के गर्त में
छिपा है
हर व्यक्ति के अंदर
एक सरोवर
यह सरोवर है
आत्मसंतुष्टि का
इस सरोवर में डूबना ही
है अहोभाव।
नहीं तो सब. कुछ होते हुए भी
दिखाई देगा चारों तरफ
बस अभाव ही अभाव।