उदासी नज़र आती है भोर के चाँद में, रात के सफ़र बाद लौटता है माँद में।।
सितारों की महफ़िलें छूट-सी जाती हैं, ख़ामोशियाँ उतरतीं उसकी फ़रियाद में।।
रात भर बाँटता रहा उजाला सभी को, ख़ुद तन्हा रह गया जैसे किसी की याद में।।
ढलती हुई रात का दर्द भला पूछता कौन, चाँद भी तो छिप जाता है अपने अवसाद में।।
जो रात के अँधेरों को रोशन करता रहा, वही थका-सा मिलता है सुनहरी प्रभात में।।
शायद हर रोशनी का यही सच है— कुछ दर्द छिपे होते हैं उसके जज़्बात में।।
भोर का चाँद कहता है चुपचाप इतना, हर मिलन की आहट छिपी है विरह के बाद में।।
-प्रदीप सोनसर्व