*शीर्षक: स्नेह लिख रहा हूँ*
चारों ओर बिखरी है उदासी,
जीवन सादा और नीरस है,
इस मरुस्थल सी दुनिया में,
ढूँढ रहा हूँ कहाँ वो रस है?
पर हार मानकर बैठूँ क्यों?
मन में नया संकल्प जगा रहा हूँ,
सूखे पत्तों जैसे इस जीवन में,
रंग भरने का हुनर सिखा रहा हूँ।
उठाई है आज कलम मैंने,
दुखों की हर लकीर मिटा रहा हूँ,
प्राणिमात्र के सूने हृदय में,
प्रेम की अब अलख जगा रहा हूँ।
कोई बैर नहीं, कोई भेद नहीं,
सबको अपना मान, हाथ बढ़ा रहा हूँ,
जग का हर सूना कोना महकाने को,
मैं स्नेह-सिक्त नित नए पद सजा रहा हूँ ।
पशु हो, पक्षी हो या मानव,
सबके प्रति करुणा भाव जगा रहा हूँ,
कांटों से भरी इन राहों में,
मुस्कान के सुंदर फूल खिला रहा हूँ।
शब्दों में घोल अंतर्मन का अनुराग,
मैं एक नया संसार रच रहा हूँ,
धरा के हर एक स्पंदन में,
आज मैं केवल स्नेह लिख रहा हूँ।
-प्रभात कुमार “प्रभात”