इश्क़ सिर्फ़ किसी को
देखकर मुस्कुराना नहीं,
उसकी ख़ामोशी पढ़ लेना भी है,
बिना पूछे उसके दर्द को
थोड़ा-सा समझ लेना भी है।
इश्क़ सिर्फ़ पास रहने का
नाम नहीं होता,
कभी-कभी दूर रहकर भी
किसी की फ़िक्र करते रहना
इश्क़ होता है।
हम अक्सर चाहते हैं—
कोई हमें समझे,
कोई हमारी कमी महसूस करे,
लेकिन इश्क़ शायद वहाँ से शुरू होता है
जहाँ हम पूछते हैं—
“मैं उसे कितना समझ पाया?”
इश्क़ में सिर्फ़ दिल नहीं,
समझ भी लगती है;
सिर्फ़ चाहत नहीं,
थोड़ी ज़िम्मेदारी भी लगती है।
हर रिश्ते में
कुछ दिन आसान होते हैं,
कुछ दिन बहुत भारी;
कुछ शामें साथ की होती हैं,
कुछ रातें इंतज़ार की।
जो अच्छे दिनों में साथ चले,
वो अपना हो सकता है;
लेकिन जो बुरे दिनों में
आपका हाथ छोड़ने के बजाय
आपकी चाल धीमी कर दे—
वही इश्क़ समझता है।
इश्क़ का सबसे कठिन हिस्सा है—
किसी को बदलने की कोशिश न करना,
उसकी कमियों के साथ भी
उसकी अच्छाइयों को देख पाना।
क्योंकि प्रेम का अर्थ
किसी को अपने जैसा बनाना नहीं,
बल्कि उसकी अलग दुनिया में
अपने लिए एक छोटा-सा स्थान बना लेना है।
और हाँ…
इश्क़ में आत्मसम्मान भी ज़रूरी है,
हर बार झुक जाना प्रेम नहीं;
जहाँ सम्मान ख़त्म हो जाए,
वहाँ रिश्ता बच सकता है,
लेकिन इश्क़ नहीं।
उम्र ने मुझे इतना तो सिखाया है—
इश्क़ जवान दिलों की
सिर्फ़ बेचैनी नहीं,
यह उन लोगों की ख़ामोश समझ है
जो बहुत कुछ खोकर भी
किसी के लिए बुरा नहीं चाहते।
अब इश्क़ से कोई शिकायत नहीं,
न पाने की ज़िद,
न खोने का डर।
बस एक इच्छा है—
जिसे दिल में जगह दूँ,
उसके जीवन में
सुकून की वजह बनूँ,
बोझ की नहीं।
शायद इश्क़ का
सबसे गहरा अर्थ यही है—
किसी को अपना कहने से पहले
उसकी आज़ादी का सम्मान करना,
और उसे खो देने के बाद भी
उसकी खुशी की दुआ करना।
क्योंकि सच्चा इश्क़
हाथ पकड़ने से कहीं बड़ा है—
वह उस हाथ को
छोड़ने की हिम्मत भी रखता है,
जब सामने वाले की खुशी
आपसे दूर जाने में हो।