विज्ञापन

साहित्य वैभव की चर्चा गली-गली

Powari Bhasha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मातृभाषा पोवारी
        
                                                    
                            
साहित्य वैभव कर बढ़त चली।
साहित्य वैभव की चर्चा,
आता होय रही से गली -गली।।

आता पोवारी भाषा
नवों- नवों साहित्य मा ढलत चली।
देखता- देखता,
मातृभाषा मा तरुणाई चढ़त चली।।

क्रांति को पहले
मातृभाषा पोवारी होती भोली- भाली।
क्रांति को आलोक मा,
मातृभाषा आता श्रृंगारित बनत चली।।

मातृभाषा पोवारी
साहित्य को हर विधा मा ढलत चलीं।
क्रांति को आलोक मा,
पहले दून अधिक आकर्षक बनत चलीं।।

मातृभाषा पोवारी
बसंत को बहारों वानी बहरत चली।
हिंदी साहित्यिक मंचों पर,
प्रकाशित होयके प्रतिष्ठित होत चली।।

आता पोवारी भाषा
हिंदी साहित्यिक मंचों पर गूंजत चलीं।
आता पोवारी भाषा,
हिंदी मंचों पर सज-धज के इठलात चलीं।।

आता पोवारी भाषा
डिजिटल माध्यमों मा रंग बिखेरत चलीं।
आता पोवारी भाषा,
नव-युग मा नवीं पहचान बनावत चलीं।।

- ओ सी पटले
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile