आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

साहित्य वैभव की चर्चा गली-गली

                
                                                         
                            मातृभाषा पोवारी
                                                                 
                            
साहित्य वैभव कर बढ़त चली।
साहित्य वैभव की चर्चा,
आता होय रही से गली -गली।।

आता पोवारी भाषा
नवों- नवों साहित्य मा ढलत चली।
देखता- देखता,
मातृभाषा मा तरुणाई चढ़त चली।।

क्रांति को पहले
मातृभाषा पोवारी होती भोली- भाली।
क्रांति को आलोक मा,
मातृभाषा आता श्रृंगारित बनत चली।।

मातृभाषा पोवारी
साहित्य को हर विधा मा ढलत चलीं।
क्रांति को आलोक मा,
पहले दून अधिक आकर्षक बनत चलीं।।

मातृभाषा पोवारी
बसंत को बहारों वानी बहरत चली।
हिंदी साहित्यिक मंचों पर,
प्रकाशित होयके प्रतिष्ठित होत चली।।

आता पोवारी भाषा
हिंदी साहित्यिक मंचों पर गूंजत चलीं।
आता पोवारी भाषा,
हिंदी मंचों पर सज-धज के इठलात चलीं।।

आता पोवारी भाषा
डिजिटल माध्यमों मा रंग बिखेरत चलीं।
आता पोवारी भाषा,
नव-युग मा नवीं पहचान बनावत चलीं।।

- ओ सी पटले
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर