कह भी ना पाऊँ,छुपा भी ना पाऊँ
दिल में रक्खू तो बहुत घवराऊँ…
क्यों ये घुटन सी आख़िर दिल में रहती है,
हर साँस मेरी, मुझसे कुछ तो कहती है…
लिख भी ना पाऊँ, जता भी ना पाऊँ,
इस उथल- पुथल को बता भी ना पाऊँ.…
मन कहे मेरा, तू ये कर, मन कहे मेरा,तू वो कर,
कर भी ना पाऊँ,डर सी मैं जाऊँ…
पंख होते शायद मेरे तो मैं उड़ जाऊँ…
पिंजरा है ख़ाली,दिल में मची क़बाली,
सुन भी ना पाऊँ, सुना भी ना पाऊँ
पर दिल ही दिल में,मैं घबराऊँ
अश्कों का समुंदर है मेरे अंदर,
खोल दूँ उसको तो,
सबकुछ डूबाऊँ…
कह भी ना पाऊँ, छुपा भी ना पाऊँ
दिल में रक्खू तो बहुत घबराऊँ…
दरिया सा इस दिल में भरा रेत का,
वहा भी ना पाऊँ, उड़ा भी ना पाऊँ…
अपनी भावनाओं को शब्दों में कब तक बताऊँ…
कोई सुने मेरी ये आस लगाऊँ…