आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कह भी ना पाऊँ, छुपा भी न पाऊँ

                
                                                         
                            कह भी ना पाऊँ,छुपा भी ना पाऊँ
                                                                 
                            
दिल में रक्खू तो बहुत घवराऊँ…

क्यों ये घुटन सी आख़िर दिल में रहती है,
हर साँस मेरी, मुझसे कुछ तो कहती है…

लिख भी ना पाऊँ, जता भी ना पाऊँ,
इस उथल- पुथल को बता भी ना पाऊँ.…

मन कहे मेरा, तू ये कर, मन कहे मेरा,तू वो कर,
कर भी ना पाऊँ,डर सी मैं जाऊँ…

पंख होते शायद मेरे तो मैं उड़ जाऊँ…
पिंजरा है ख़ाली,दिल में मची क़बाली,
सुन भी ना पाऊँ, सुना भी ना पाऊँ
पर दिल ही दिल में,मैं घबराऊँ

अश्कों का समुंदर है मेरे अंदर,
खोल दूँ उसको तो,
सबकुछ डूबाऊँ…

कह भी ना पाऊँ, छुपा भी ना पाऊँ
दिल में रक्खू तो बहुत घबराऊँ…

दरिया सा इस दिल में भरा रेत का,
वहा भी ना पाऊँ, उड़ा भी ना पाऊँ…
अपनी भावनाओं को शब्दों में कब तक बताऊँ…
कोई सुने मेरी ये आस लगाऊँ…
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर