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किस्सा ए देहरादून

Pooja Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी सुकूँ देता एक दरख्त सा था
        
                                                    
                            
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
महकती बंसमति खेतों खलिहानों में
चाय भी चुस्कियां लेती बागानों में
बारिश की बौछारों में चहकता सा था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
रौनके रहती थी उस वक्त बाज़ारों में
न घूमते थे लोग बंद डिब्बे सी कारों में
बचपन बुढ़ापा साथ चला करता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
घर का साग गाँव में महकता था
चटखती थी मक्की के दानों सी बातें
कभी आती नानी के घर से सौगातें
सावन उन दिनों क्या खूब बरसता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
न झगडे थे न नफरत रहती दिलों में
दूर से आया भी रिश्तेदार ठहरता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
अब तो कतारें है भीड़ है लोगों की
अब तो यहां भी भरमार है धोखे की 
हर तरफ होड़ मची है सिर्फ पैसे की
इंसानी रिश्तों के कोमल धागे टूट रहे हैं
अब इंसान भी मोटर बन घूम रहे हैं
वादियों मे सिमटा एक स्वर्ग सा था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था


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