कभी सुकूँ देता एक दरख्त सा था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
महकती बंसमति खेतों खलिहानों में
चाय भी चुस्कियां लेती बागानों में
बारिश की बौछारों में चहकता सा था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
रौनके रहती थी उस वक्त बाज़ारों में
न घूमते थे लोग बंद डिब्बे सी कारों में
बचपन बुढ़ापा साथ चला करता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
घर का साग गाँव में महकता था
चटखती थी मक्की के दानों सी बातें
कभी आती नानी के घर से सौगातें
सावन उन दिनों क्या खूब बरसता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
न झगडे थे न नफरत रहती दिलों में
दूर से आया भी रिश्तेदार ठहरता था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
अब तो कतारें है भीड़ है लोगों की
अब तो यहां भी भरमार है धोखे की
हर तरफ होड़ मची है सिर्फ पैसे की
इंसानी रिश्तों के कोमल धागे टूट रहे हैं
अब इंसान भी मोटर बन घूम रहे हैं
वादियों मे सिमटा एक स्वर्ग सा था
मेरा देहरादून कुछ अलग सा था
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