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तुम्हे कैसे मैं बतलाऊँ

pooja srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नयन भीगे, अधर सूखे, किसे यह पीर दिखलाऊँ,
        
                                                    
                            
जो भीतर टूटता है, वो भला कैसे मैं समझाऊँ,
सँभाला था जिसे बरसों, वही विश्वास दरका है
तुम्हारी बात का मुझ पर हुआ क्या वार बतलाऊँ,

मधुर थे शब्द, पर उनमें छिपा था तीर, क्या गाऊं,
हँसी में आह घुलती है, उसे कैसे मैं झुठलाऊँ,
लबों पर फूल थे लेकिन हृदय पर घाव कर बैठे,
छिपाकर मुस्कुराती हूँ, हृदय बेज़ार बतलाऊँ ।


न कोई रोष है तुमसे, न कोई दोष ठहराऊँ,
तुम्हीं तो प्राण हो मेरे, तुम्हें कैसे मैं ठुकराऊँ,
बस इतना ही कहूँगी, वेदना जो दिल में है मेरे,
तुम्हीं थे ज़िंदगी मेरी, तुम्हीं थे प्यार बतलाऊँ,

व्यथा हद से जो बढ़ जाए, कलम में ही पिघल जाऊँ,
यही इक राह बाकी है, ग़ज़ल बनकर सँवर जाऊँ,
अधूरे शब्द, गीले पृष्ठ, बस इतनी कमाई है,
कलम ही अब सहारा है, यही है धार बतलाऊँ।।
-पूजा आर श्रीवास्तव
 
2 घंटे पहले
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