आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम्हे कैसे मैं बतलाऊँ

                
                                                         
                            नयन भीगे, अधर सूखे, किसे यह पीर दिखलाऊँ,
                                                                 
                            
जो भीतर टूटता है, वो भला कैसे मैं समझाऊँ,
सँभाला था जिसे बरसों, वही विश्वास दरका है
तुम्हारी बात का मुझ पर हुआ क्या वार बतलाऊँ,

मधुर थे शब्द, पर उनमें छिपा था तीर, क्या गाऊं,
हँसी में आह घुलती है, उसे कैसे मैं झुठलाऊँ,
लबों पर फूल थे लेकिन हृदय पर घाव कर बैठे,
छिपाकर मुस्कुराती हूँ, हृदय बेज़ार बतलाऊँ ।


न कोई रोष है तुमसे, न कोई दोष ठहराऊँ,
तुम्हीं तो प्राण हो मेरे, तुम्हें कैसे मैं ठुकराऊँ,
बस इतना ही कहूँगी, वेदना जो दिल में है मेरे,
तुम्हीं थे ज़िंदगी मेरी, तुम्हीं थे प्यार बतलाऊँ,

व्यथा हद से जो बढ़ जाए, कलम में ही पिघल जाऊँ,
यही इक राह बाकी है, ग़ज़ल बनकर सँवर जाऊँ,
अधूरे शब्द, गीले पृष्ठ, बस इतनी कमाई है,
कलम ही अब सहारा है, यही है धार बतलाऊँ।।
-पूजा आर श्रीवास्तव
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर