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हिसाब- ए -दर्द

pooja srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेजुबाँ महफिल में शोर होने लगा ,
        
                                                    
                            
न जाने कौन पढ़ गया खामोशी मेरी,

इश्क का जोड़ करके दर्द हासिल लिया,
शून्य निकली तेरे बिन खुशी सब मेरी ,

भाग्य की अक्ष रेखा पर खींचे जो स्वप्न ,
वक्त ने लुप्त कर दी ज्यामिति सब मेरी ,

तेरे वादों का गुणनफल था स्वर्णिम बहुत ,
दर्द में कैसे बदली दिलकशी फिर मेरी,

वक्त ने थे किए विभाजन बहुत ,
बाँट पाया नहीं तिश्नगी वो मेरी,

तुम अनन्तों सदृश मैं सीमित रही ,
कितनी बेबस हुई बेबसी फिर मेरी,

गिन सको तो गिनो प्रतिशत आंसू के
सौ में सौ अंक पाती है नमी ये मेरी,

नेह का वृत्त था केंद्र भी तुम ही थे ,
और तुम्हारी परिधि जिंदगी थी मेरी ,

किस कदर दूरी का मान बढ़ता गया,
ऋण में जाती रही रोशनी फिर मेरी,

दर्द का ये गणित 'पूजा 'कहता है अब ,
शून्य तक भी न पहुंची आशिकी ये मेरी ।।
-पूजा आर श्रीवास्तव
 
एक दिन पहले
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