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गजल इज्तिमा

Poetry Blog

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            औरतों का इज्तिमा लगा है
        
                                                    
                            
और चार सू हा-हा लगा है

पकड़े जब भी तेरे घर से गए
रास्ते मे फिर थाना लगा है

सोते हुए मुझे जगाया किसने
रात में किसका धड़का लगा है

उसने तो बस सच बोला था
लोगो के मुंह पे लावा लगा है

उनकी नजर का तीर कसम से
मेरे दिल पर तिरछा लगा है

मोहब्बतों से तौबा करते हुए भी
मोहब्बत करने पे गोया लगा है

फराज-ओ-गालिब-शैदा हुए है
कतील-ओ-फिराक-इंशा लगा है

लगा था गुल जो सियाह मुझको
वो बालों में तिरे पीला लगा है

धोखा देते हुए उसने कहा 'तनहा'
कहो अब तुमको कैसा लगा है।

- तारिक़ अज़ीम 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले
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