ग़ज़ल - मुजफ़्फ़र हनफ़ी
नगर नगर में ब ज़ाहिर मिलाप हम ने किए
फ़साद ख़ून में है वार आप हम ने किए
शुमार करते हैं सांसें क़याम के दौरान
सफ़र किए तो क़दम नाप नाप हम ने किए
फ़रिश्ता सर ब गिरेबाँ के साफ़ थी नीयत
ख़ुदा गवाह के जी भर के पाप हम ने किए
मगर हज़ूर का रस्ता कभी नहीं काटा
क़सूर यूं तो बहुत माई बाप हम ने किए
मिलन हुआ तो दहकती हुई चिताओं में
हज़ार प्यार पुराणों के जाप हम ने किए
-मुजफ़्फ़र हनफ़ी