नग़्मे उनके सदा गुनगुनाते रहे
चोट खाते रहे मुस्कुराते रहे
शक वफ़ा पर हमारी था शायद उन्हें
हमको हर मोड़ पर आज़माते रहे
थी मोहब्बत हमें जानते वो भी थे
फिर भी वो बे-रुख़ी ही दिखाते रहे
उनकी यादें सबब बन गईं दर्द का
दर्द को हम हँसी में उड़ाते रहे
मुंतज़िर रहती हैं आँखें दहलीज़ पर
आतिश-ए-इश्क़ दिल में जलाते रहे
झूठे चेहरे कभी दिल में रहते नहीं
प्यार से दिल में उनको बसाते रहे
वो नहीं आएँगे जानते हम भी हैं
दिल में पर ख़्वाब उनके सजाते रहे
ज़िन्दा रहने को काफ़ी है उम्मीद ही
झूठी उम्मीद पर दिन बिताते रहे