सबक इश्क का हमको भी तुम सिखा दो
बिगाड़े हैं जो रिश्ते उनको बना दो
चलो सौंपते डोर हम अपनी तुमको
जुबाँ से अभी आज उल्फ़त जता दो
मोहब्बत रहेगी हमेशा ही तुमसे
बुझी चाहतों की शमा फिर जला दो
मिले राह में ख़ार ही ख़ार हमको
मिरी राहों में अब तो तुम गुल बिछा दो
सदा मुश्किलें झेली हमने अकेले
कभी दिल से तुम भी हमें हौसला दो
न इक दूजे बिन है गुज़ारा हमारा
चलो बीती बातों पे मिट्टी गिरा दो
ग़लत-फ़हमी आए नहीं बीच अपने
गिले शिकवे भी आज सारे मिटा दो