विज्ञापन

नग़्मे गुनगुनाते रहे

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नग़्मे उनके सदा गुनगुनाते रहे
        
                                                    
                            
चोट खाते रहे मुस्कुराते रहे

शक वफ़ा पर हमारी था शायद उन्हें
हमको हर मोड़ पर आज़माते रहे

थी मोहब्बत हमें जानते वो भी थे
फिर भी वो बे-रुख़ी ही दिखाते रहे

उनकी यादें सबब बन गईं दर्द का
दर्द को हम हँसी में उड़ाते रहे

मुंतज़िर रहती हैं आँखें दहलीज़ पर
आतिश-ए-इश्क़ दिल में जलाते रहे

वो नहीं आएँगे जानते हम भी हैं
दिल में पर ख़्वाब उनके सजाते रहे

ज़िन्दा रहने को काफ़ी है उम्मीद ही
झूठी उम्मीद पर दिन बिताते रहे
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Chandra prakash

28 कविताएं

View Profile