आज लिखने का बड़ा मन है, मगर क्या लिखूँ...
जनता से किए वो वादे लिखूँ,
या चुनाव के बाद गायब हुए इरादे लिखूँ...
विकास के बड़े-बड़े दावे लिखूँ,
या सड़कों के गड्ढों में दबे वो वादे लिखूँ...
जो चुनाव से पहले अपने बनकर आए थे,
या चुनाव जीतते ही जनता को पहचानना भूल गए,
उन नेताओं का हिसाब लिखूँ...
उन भाषणों की बात लिखूँ,
जिनमें गरीब की चिंता बहुत थी,
या उन नीतियों का सच लिखूँ,
जिनमें गरीब की जेब सबसे पहले खाली हुई...
उन चमकते पोस्टरों की तस्वीर लिखूँ,
या उन्हीं पोस्टरों के पीछे छुपी
जमीनी हकीकत लिखूँ...
जो हर मंच से ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं,
उनकी राजनीति के वो अध्याय लिखूँ
जिन्हें पढ़कर किताब भी शर्मिंदा हो जाए...
या फिर उन ख़ामोश जनता की बात लिखूँ,
जो पाँच साल सब देखती है,
और पाँचवें साल फिर उसी उम्मीद में
उंगली पर स्याही लगवा आती है...
दर्द ये नहीं कि नेता झूठ बोलते हैं,
दर्द ये है कि अब झूठ को
विकास का नाम देकर बेचने लगे हैं।
आज सोच रहा हूँ क्या लिखूँ...
फिर लगा—
राजनीति पर सच लिखना ही काफी है,
क्योंकि आजकल सच लिखते ही
आधा शहर नाराज़ और आधा शहर बेनकाब हो जाता है।