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"स्वयं तक लौटने की यात्रा"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत समय तक
        
                                                    
                            
मैं दूसरों की आँखों में
अपना प्रतिबिंब खोजता रहा।
किसी की स्वीकृति में
अपनी सार्थकता,
किसी की प्रशंसा में
अपने अस्तित्व का प्रमाण।
पर हर उत्तर के बाद भी
एक प्रश्न शेष रह जाता था।

मैंने अपने सत्य के किनारों को
कई बार तराशा,
ताकि वे दूसरों की अपेक्षाओं में
सहज समा सकें।
किन्तु हर समझौते के साथ
भीतर कुछ और मौन हो गया।
मानो आत्मा
अपने ही घर में
अतिथि बनती जा रही हो।

यह कैसी विचित्र आकांक्षा थी—
सबके निकट आने की।
जितना मैं सबका होने चला,
उतना ही स्वयं से दूर होता गया।
एक दिन लगा,
मेरे पास अनेक संबंध हैं,
किन्तु अपना कोई संवाद नहीं।

तब मैंने स्वयं से पूछा—
क्या जीवन का प्रयोजन
स्वीकृतियों का संग्रह है?
या फिर
उस एक आंतरिक स्वर को सुनना,
जो भीड़ के शांत हो जाने पर भी
अविचल बना रहता है?
उत्तर कहीं बाहर नहीं था।

धीरे-धीरे समझ में आया कि
सुख प्रशंसा का प्रसाद नहीं,
अपितु आत्मस्वीकार का उदय है।
जब अपेक्षाओं का कोलाहल थमता है,
तब भीतर एक निर्मल प्रदेश प्रकट होता है,
जहाँ किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
केवल होना पर्याप्त होता है।

अब भी मैं खोज में हूँ,
किन्तु दिशा बदल गई है।
मैं दूसरों की संतुष्टि का भार नहीं,
अपने अंतःकरण की साक्षी खोजता हूँ।
और जितना स्वयं के निकट आता हूँ,
उतना ही स्पष्ट होता जाता है कि
शांति वहाँ नहीं मिलती
जहाँ सब मुझे स्वीकार लें,
शांति वहाँ जन्म लेती है
जहाँ मैं स्वयं को अस्वीकार करना छोड़ दूँ।
एक महीने पहले
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