मैं कहाँ जा रहा हूँ?
भीड़ की ओर, या अपने मौन की ओर?
जो कुछ पाया, क्या वह मेरा है?
या मैं ही धीरे-धीरे खोता गया?
संचय क्या है?
समृद्धि का विस्तार, या भय का एक आवरण?
शय्या कोमल है, निद्रा नहीं।
भवन ऊँचे हैं, दृष्टि नहीं।
दीप जलते हैं, उजाला नहीं।
यदि अंतस मरुभूमि रहे, तो उपलब्धियाँ किसलिए?
हवा दिखती नहीं, जीवन देती है।
मैं उसे तब पहचानता हूँ, जब श्वास ठहर जाती है।
जल बहता है, मैं उसे तब खोजता हूँ, जब प्यास जाग उठती है।
क्या मैं स्रोत से दूर हूँ?
या स्वयं से?
हर प्रभात एक किरण आती है।
बिना आग्रह, बिना अपेक्षा।
मैं उसे सामान्य समझ, लौटा देता हूँ।
श्वास चलती है, मौन पथिक-सी।
जिस दिन यह रुक जाएगी,
क्या मेरा कुछ शेष रहेगा?
धन देता है साधन भर।
साधना नहीं।
औषधि देती है उपचार भर।
जीवन नहीं।
सुविधाएँ मिलती हैं, संतोष नहीं।
संतोष शायद भीतर बहती एक धारा है।
हे आत्मन...
या यह भी एक कल्पना है?
जो बिना मूल्य मिला, वही अमूल्य है।
वायु।
जल।
प्रकाश।
श्वास।
मौन।
इनका कोई बाज़ार नहीं।
जो बिकता नहीं, क्या वही सत्य है?
मैं नहीं जानता।
और शायद यही न जानना सबसे निकट है।
जब सब नाम मिटेंगे,
जब सब उत्तर चुप होंगे,
तब शायद...
कुछ भी नहीं।
या वही,
जिसे कभी नाम नहीं मिला।