दिन समाप्त नहीं होते,
केवल हमारे भीतर
कुछ अनकहे प्रदेश
धीरे-धीरे अंधकार से भर जाते हैं।
मैंने कई बार
घड़ी की सूइयों को दोष दिया,
पर हर बार पाया—
समय नहीं,
मेरी ही चेतना
अनुपस्थित थी उन क्षणों में।
कितना कुछ था
जो जिया जा सकता था—
एक वृक्ष की छाया,
किसी मौन का कंपन,
स्वयं से हुई
एक सच्ची बातचीत।
किन्तु मैं
व्यस्तताओं के उस निर्जन मेले में
अपना ही चेहरा खोजता रहा,
जहाँ उपलब्धियाँ थीं,
पर कोई अंतराल नहीं
जिसमें आत्मा साँस ले सके।
अब लगता है—
जीवन की क्षति
मृत्यु से नहीं होती,
वह होती है
उन क्षणों से
जिन्हें हम बिना जागे जी जाते हैं।
और समय—
वह तो आज भी
उतना ही निस्पृह,
उतना ही विस्तृत है;
केवल मैं ही
अपने भीतर से
धीरे-धीरे कम होता गया॥