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"मैं अपने ही भीतर का पथिक"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परिस्थितियाँ
        
                                                    
                            
कब किसी मनुष्य का अंतिम सत्य रही हैं?
वे तो केवल
समय की थकी हुई सतह पर
उभरती और मिटती रेखाएँ हैं।
मनुष्य का वास्तविक आकार
उस मौन में जन्म लेता है
जहाँ वह स्वयं से छिप नहीं सकता।

मैंने देखा है—
भीतर की धारणाएँ
धीरे-धीरे रक्त में उतरती हैं,
और फिर वही
दृष्टि बनकर
समूचे जगत् पर फैल जाती हैं।
यदि मन स्वयं को अंधकार मान ले,
तो सूर्य भी व्यर्थ है;
और यदि भीतर एक क्षीण दीप शेष हो,
तो रात्रि कभी पूर्ण नहीं होती।

कितना विचित्र है—
मनुष्य बाहर की पराजयों से नहीं टूटता,
वह टूटता है
जब अपने ही स्वरूप पर से
उसका विश्वास च्युत हो जाता है।
आत्मा का पतन
किसी युद्धभूमि में नहीं,
निस्तब्ध अकेलेपन में घटित होता है।

मैं अपने भीतर
एक अनाम यात्री की पदचाप सुनता हूँ।
वह मुझसे कहता है—
“तुम वही नहीं हो
जो परिस्थितियों ने तुम्हें बना दिया;
तुम वह भी हो
जिसे अभी तुम्हें पहचानना शेष है।”

शायद जीवन का अर्थ
किसी उपलब्धि में नहीं,
उस निरंतर खोज में है
जहाँ मनुष्य
अपने ही अंतरालों से गुजरते हुए
एक गहरे, अदृश्य सत्य तक पहुँचता है।
और तब—
वह संसार को नहीं,
पहले स्वयं को बदलता है।

अंततः
मनुष्य उसी सत्ता में रूपांतरित हो जाता है
जिसे वह
अपने मौन के सबसे गहरे क्षणों में
सत्य स्वीकार कर लेता है।
शेष सब—
समय की धूल है,
क्षणभंगुर,
और विस्मृति के लिए अभिशप्त।
एक महीने पहले
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