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घायल आधार

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर की बुनियाद हिली, दीवारें खामोश हो गईं,
        
                                                    
                            
रिश्तों के पुराने फूल अब मुरझाए खड़े हैं।
बेटी, जो बिना राह की मंज़िल खो गई,
पिता की झुकी गर्दन में उसकी चिंता झूलती है।

मौसमों की जंग ने हर मधुरता मिटा दी,
बहारों में भी अब घावों की गंध है।
नाम जिनके लिए वार तय थे,
वे बच गए, पर निर्दोष की चोट रह गई।

प्यार अब कैसे पनपे इस कबीले में,
जहाँ तू-तू, मैं-मैं की लड़ाई चली।
रिश्तों की ज़मीन खुरदरापन लिए खड़ी है,
स्नेह अब भी अपनी राह खोजता है।

चाहत का असर कम है, सितमगर अधिक,
हर बार उम्मीदें रोकी जाती हैं।
हर चोट एक नई सीख बनकर उभरती है,
और हमें स्वयं को समझना सिखाती है।

कहानियों के बहाने हम अपनी स्थिति लिखते हैं,
पर किरदार खुद हमें बार-बार घायल कर जाते हैं।
पढ़ते-पढ़ते समझते हैं, चोटें गहरी हैं,
और स्मृतियाँ हमारे साथ रहती हैं।

रिश्ते अधूरे हैं, पर अनुभव पूर्ण।
घाव और खामोशी हमें जीवन की गहराई दिखाते हैं।
सफलता केवल जीत में नहीं,
संघर्ष में भी छुपी होती है।

जीवन ने हमें खड़ा किया,
असहमति और दर्द के बीच।
हर वार, हर चोट ने सिखाया,
कि प्रेम सिर्फ फूल नहीं, कांटे भी है।

हम खड़े हैं, आधार घायल होने के बावजूद,
स्मृति और अनुभव की ताकत से मजबूत।
जहाँ दर्द झूलता है, वहीं
नई राह की रोशनी भी आती है।

घाव और समय के बीच हमने खुद को पाया,
हर चोट ने भीतर की ताकत जगाई।
अब हम जानते हैं—घायल आधार भी
11 महीने पहले
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