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और दिल आत्मा को एक नई शाश्वत दृष्टि

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जलना महज़ कोई घटना नहीं,
        
                                                    
                            
यह तो एक शाश्वत अवस्था है—
जो घटती है देह की देहली पर भी,
और चेतना के अतल गर्भगृह में भी।

बाहर मिट्टी का पात्र गलता है,
तो आँखें प्रकाश को साक्ष्य देती हैं;
भीतर जब अदृश्य कोना सुलगता है,
तब अश्रु मूक लिपि में सत्य लिखते हैं।

मृत्तिका का आलोक एक आमंत्रण है,
एक सामाजिक लय, एक साझा उत्सव,
जहाँ जग अपनी प्रार्थनाएँ बुनता है—
तिमिर के विरुद्ध सामूहिक आस्था का प्रतीक।

पर अंतर का विरह ऋतु-मुक्त है,
बिना पदचाप, अनाहूत सुलगता हुआ;
शब्द के आघात या स्वप्न-भंग से उपजा,
एक निशब्द धुआँ, जिसका कोई साक्षी नहीं।

कैसा विराट् और समानांतर विरोधाभास!
एक ही अनंत नभ के तले,
कहीं दीप की आभा का उल्लास है,
तो कहीं हृदय की एकाकी विरह-अग्नि।

बाहरी 'कहीं' का एक निश्चित भूगोल है—
चौखट, दहलीज़ या देवालय का कोना;
भीतरी 'कहीं' का कोई मानचित्र नहीं,
यह सीमाओं से परे मनुष्य का अनंत लोक है।

इस आत्म-क्षय को केवल विनाश मत कहो,
घटता हुआ मोम ही तो मार्ग दिखाता है;
भीतर की तपन ही संवेदना को जनमती है,
मौन वेदना ही अंततः संगीत और काव्य है।

जिसने इस अंतर्दह को कभी सहा नहीं,
वह जीवन की प्रखर गहराई क्या जाने?
दीप जग को बाहरी आलोक देता है,
और दिल आत्मा को एक नई शाश्वत दृष्टि।

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एक घंटा पहले
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