कभी ऐसा भी होता है—
दिशाएँ सामने रहती हैं,
पर मार्ग अनुपस्थित।
पाँव ठिठकते नहीं,
केवल भीतर का विश्वास
धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगता है।
संशय
कोई बाहरी अंधकार नहीं;
वह चेतना की दीवारों पर उगती
एक सूक्ष्म काई है,
जो मनुष्य को
अपने ही प्रकाश से अपरिचित कर देती है।
मैंने कई बार
वापस लौट जाने के विषय में सोचा—
उन परिचित पगडंडियों पर,
जहाँ असफलता का भय नहीं था।
किन्तु वहाँ
जीवन भी कहाँ था?
अज्ञात का आह्वान
सदैव शब्दों में नहीं आता।
कभी वह
एक अस्पष्ट बेचैनी बनकर
रात्रि के तीसरे प्रहर में
आत्मा को जगाए रखता है।
तभी अनुभव हुआ—
मार्ग मिलते नहीं,
मनुष्य उन्हें
अपने संकल्प की अग्नि से गढ़ता है।
शिलाएँ वही रहती हैं,
पर दृष्टि बदलते ही
वे सीढ़ियाँ बन जाती हैं।
भीड़ के पीछे चलना
सुरक्षित अवश्य है,
किन्तु वहाँ
व्यक्ति का स्वर विलीन हो जाता है।
अस्तित्व
अनुकरण में नहीं,
अपने पृथक कंपन में जन्म लेता है।
काँटों से भरे पथ पर
चलना कठिन था;
पर वही पीड़ा
धीरे-धीरे भीतर
एक प्रभूत निस्तब्धता में बदल गई—
ऐसी निस्तब्धता,
जिसमें भय का अंतिम स्वर भी
डूब जाता है।
अब समझता हूँ—
भोर आकाश में नहीं उगती,
वह पहले मनुष्य के भीतर जन्म लेती है।
जो स्वयं के अंधकार से गुजर सके,
वही
समय की धूल पर
अपने पदचिह्न छोड़ पाता है।