एक अनाम विस्तार है भीतर—
न समय,
न दिशा,
न किसी अस्तित्व का अंतिम प्रमाण।
वहीं कहीं
धीमे धुएँ की तरह तैरता है
मेरा मनोजगत।
मैं उसे “मेरा” कहता तो हूँ,
पर यह अधिकार भी
शायद एक भ्रम ही है।
कौन जानता है—
मैं उसका स्वामी हूँ
या वही मुझे स्वप्न की भाँति
जी रहा है।
इस भीतरी रंगमंच पर
चेहरे निरंतर बदलते रहते हैं।
कभी मैं
अपने ही आदर्शों की ऊँचाई पर खड़ा
नायक प्रतीत होता हूँ,
मानो सत्य ने
क्षणभर को देह धारण कर ली हो।
पर उसी क्षण
भीतर का कोई अदृश्य हाथ
मुकुट उतार देता है,
और मैं देखता हूँ—
जिसे विजय समझा था,
वह केवल
अहंकार का सौंदर्यशास्त्र था।
मेरा विरोधी
कभी बाहर नहीं मिला।
हर युद्ध के पश्चात
टूटी हुई तलवार पर
मेरा ही नाम लिखा मिला है।
खलनायक भी मैं ही हूँ—
वह जो
अपने ही निर्मित सत्यों पर
संदेह करता है,
जो हर निष्कर्ष के बाद
एक और प्रश्न जन्म देता है।
शायद विनाश ही
उसकी एकमात्र साधना है,
क्योंकि टूटे बिना
कोई भी आत्मा
अपने गहरे स्वरूप तक नहीं पहुँचती।
और जब अस्तित्व
अत्यधिक गंभीर हो उठता है,
तब मैं
विदूषक बन जाता हूँ।
अपनी ही विडंबनाओं पर
धीरे से हँसता हूँ—
जैसे कोई साधु
श्मशान में दीप जला दे।
वह हँसी आनंद नहीं,
एक थकी हुई स्वीकृति है।
क्योंकि कुछ सत्य
इतने विराट होते हैं
कि भाषा उन्हें छूते ही
भंग हो जाती है।
पर इन सबके पार
एक और उपस्थिति है—
निर्विकार,
निस्पंद,
लगभग अज्ञेय।
वह न अभिनय करती है,
न निर्णय देती है।
वह केवल देखती है—
मेरे भीतर उठते
सारे प्रेम, भय, हिंसा, करुणा
और असंख्य अंतर्विरोध।
शायद वही
मेरा वास्तविक स्वरूप है,
या शायद
वह भी केवल
एक और परत है
अनंत अंधकार की।
अब धीरे-धीरे स्पष्ट होता है—
यह समूचा जगत
किसी अंतिम उत्तर की नहीं,
अनवरत आत्म-संवाद की रचना है।
मैं ही प्रश्न हूँ,
मैं ही प्रतिप्रश्न।
मैं ही रंगमंच,
मैं ही उसका क्षणभंगुर अभिनय।
और अंत में
जब सारे पात्र विलीन हो जाते हैं,
तब भी कुछ शेष रहता है—
न उसे “मैं” कह सकता हूँ,
न “सत्य”।
वह केवल
एक अथाह मौन है,
जिसमें
सारा अस्तित्व
धीरे-धीरे
स्वयं को भूलता चला जाता है।