टेबल पर पड़े हैं
कुछ पीले पड़ चुके पत्र,
और कुछ प्रश्न—
जो अब भी बंद हैं।
एक ओर
निर्जन का निमंत्रण है,
दूसरी ओर
एक मौन आत्मा की पुकार।
यह किसी और का निर्णय नहीं,
यह स्वयं के सम्मुख
स्वयं की उपस्थिति का प्रमाण है।
जब दिशाएँ बँट जाती हैं,
और चेतना
दो धाराओं में खिंचने लगती है,
तब न शास्त्र बोलते हैं,
न कोई गुरु।
एक ओर अनुभवों का पहरा है,
दूसरी ओर
असंख्य संभावनाओं का आकाश।
धुंध बाहर कम,
भीतर अधिक उतरती है।
जो आँखों से ढलके हैं,
वे पराजय के नहीं,
वे उन क्षणों के हैं
जो समय की उँगलियों से फिसल गए।
जब दो मौन पीड़ाएँ
एक-दूसरे को पहचान लेती हैं,
तब शब्द पीछे रह जाते हैं,
और सत्य
अश्रुओं की भाषा में उतरता है।
फाड़ दिया गया वह पत्र—
एक सुनिश्चित भविष्य,
एक शांत आश्रम का निमंत्रण।
लोग इसे मूर्खता कहेंगे,
पर हर त्याग
पलायन नहीं होता।
कभी-कभी आत्मा
अपने ही विरुद्ध खड़े संसार से
असहमति दर्ज करती है।
जो बोझ था,
वही अब आधार बन रहा है।
टूटे हुए स्वप्न
अब चुभते नहीं,
वे भीतर की संरचना को
और दृढ़ कर रहे हैं।
अपने सत्य के साथ खड़ा रहना,
काल के विरुद्ध नहीं,
स्वयं के पक्ष में खड़ा होना है।
अब द्वंद्व शांत है।
हाँ और ना के बीच
एक तीसरा मार्ग खुला है।
दुनिया चाहे इसे हार समझे,
पर आत्मा जानती है—
दिखावे के इस समय में
रूह से उपजे संबंध को बचाए रखना
सबसे कठिन साधना है।
अब कोई शिकायत नहीं,
केवल एक शांत मुस्कान है।
क्योंकि अंततः
स्वयं के लिए रोना ही
स्वयं को चुन लेना है।