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"अंतर्ध्वनि का आह्वान"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मोड़ पर एक धूसर छाया थी,
        
                                                    
                            
जिसे सबने दुविधा कहा।
मैंने उसे देखा—
एक निस्पंद, निर्वाक दृष्टि से।

वह न विरोध थी,
न किसी दिशा का संकेत।
वह केवल दर्पण थी,
जहाँ मेरे ही अंतःस्वर
परस्पर अपनी सत्ता पर प्रश्न थे।

चयन किसी पथ का नहीं था—
स्वयं के एक अंश को स्वीकारना था,
और दूसरे को
मौन तर्पण देना था।


दोराहे धरती पर कम बनते हैं,
वे चेतना की सूक्ष्म रेखाओं पर कटते हैं।

एक पथ था—
भीड़ के पदचिह्नों से भरा,
कोलाहल से स्पंदित।

दूसरा—
पत्तों में ढँका,
निरभ्र एकांत की ओर जाता।

बुद्धि ने
लाभ और हानि के सूत्र रचे,
पर भीतर किसी अगोचर ने कहा—

“मंज़िल कोई स्थल नहीं,
वह तो आत्मा का
क्षणिक विश्राम है।”

और मैंने
उस निर्जन की निस्तब्धता चुन ली।


संसार एक अनवरत होड़ में था।
समय—
एक अदृश्य शिकारी की तरह
पीठ पर साँस लेता हुआ।

भागते चरण,
थकी हुई श्वासें,
और नेत्रों में
एक अथाह रिक्ति।

मैं उस वृत्त से बाहर आ गया।
मैंने गति रोकी नहीं—
मैंने उसकी निरर्थकता पहचान ली।

ठहरना पलायन नहीं,
वह तो विराट के महास्वर में
अपने मौन को सुनना है।


लोगों ने विश्राम को आलस्य कहा,
किन्तु वह
मौन की दीर्घ साधना थी।

ऐसी शांति,
जो शब्दों के क्षय से नहीं,
विचारों के संतुलन से जन्मी थी।

जब भीतर का कोलाहल थमा,
तब सुनाई दिया—
पत्तों का अवसान,
वायु का अनाम आलाप,
और चेतना में बहती
एक अदृश्य नदी।

उस एकांत में
रिक्तता नहीं थी—
वह तो
पूर्णता का गहन स्पर्श था।


कामयाबी का एक दीप्त पात्र था,
जिसे संसार
बार-बार मेरे अधरों तक लाया।

उसमें क्षणिक उन्माद था,
और अहं की तीखी गंध।
मनुष्य उसमें डूबकर
स्वयं से दूर चला जाता है।

मैंने वह पात्र
धीरे से पृथ्वी पर रख दिया।

मुझे शिखर की
वह हिम-सन्न तन्हाई नहीं चाहिए,
जहाँ पहुँचकर
मनुष्य जीवित नहीं रहता—
केवल प्रतीक बन जाता है।


तब मैंने उठाया—
आत्मसंतोष का शांत घट।
यह कोई प्रदत्त सत्य नहीं था,
इसे मैंने
अपने अनुभवों की अग्नि में गढ़ा था।

उस रस में उत्तेजना नहीं,
एक शीतल, दीर्घ आभा थी।

अब न कोई शिकायत थी,
न किसी अधूरे स्वप्न की व्याकुलता।
अतीत का भार विलीन था,
भविष्य का भय भी।

मैं केवल इस क्षण में था—
पूर्णतः उपस्थित,
मुक्त,
अनाम,
और अपने ही अंतराल में
धीरे-धीरे विलीन।
एक महीने पहले
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