ठहर, पथिक! कुछ मौन धर,
गति ही जीवन-सार नहीं।
जो स्वयं से मिल न सके,
उसकी कोई हार नहीं।
दौड़ बहुत इस लोक में,
दिशा मगर दुर्लभ हुई।
अंतर का दीपक बुझे,
बाह्य ज्योति निष्फल हुई।
जो है तेरे पास आज,
वही अमूल्य निधि मान।
आत्मबल से दीप्त मन,
जग का अनुपम सम्मान।
लघु चरण भी चल पड़ें,
पर्वत झुकना सीखते।
दृढ़ संकल्पों के समक्ष,
काल पथ स्वयं लिखते।
होड़ न कर संसार से,
तू अपना ही मंत्र है।
स्वयं को पढ़, स्वयं गढ़,
तू स्वयं एक ग्रंथ है।
कल से ऊँचा आज हो,
बस इतना अभियान रख।
आत्मदीप प्रज्वलित रहे,
यही अमर पहचान रख।
जब अंतस निर्मल हुआ,
जग का रूप निखर गया।
जिसने स्वयं को जान लिया,
वह सबसे ऊपर गया।