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सत्ता के सुख की चाह में

Pandit Chandradutt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सत्ता के सुख की चाह में,
        
                                                    
                            
वो स्वदेश का रंग भूल गए।
किस मोल मिली आजादी?
जीते जी मोल को भूल गए।
कितनों ने अपने शीश चढ़ाए?
उन कुर्बानियों को भूल गए।
देश में ही करते भितरघात,
अपनी जिम्मेदारी भूल गए।
अच्छे काम की करें मुखालफत,
देश के प्रति वफ़ा भूल गए।
जनता की यहाँ किसने सोची?
मतलबी लोग सब भूल गए।
चंद्र मिल जाए सत्ता की चाबी,
ताले की कद्र करना भूल गए।
-चंद्र दत्त शर्मा
2 घंटे पहले
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