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नींद कहां इन आँखों में

Pandit Chandradutt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नींद कहां इन आँखों में ?
        
                                                    
                            
अब तू नहीं है पास मेरे,
तेरे ख्वाब के लिए ही,
तो मुझे सोना पड़ता है।
गर आ जाए तू सपने में,
तो सूरज का त्योर चढ़ता है।
ना सोने दे वो मुझको,
प्रातः मुझे उठना पड़ता है।
कैसे तोडूं बंधन उलझन?
इनसे भी जूझना पड़ता है।
-चंद्र दत्त शर्मा
3 महीने पहले
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