नींद कहां इन आँखों में ?
अब तू नहीं है पास मेरे,
तेरे ख्वाब के लिए ही,
तो मुझे सोना पड़ता है।
गर आ जाए तू सपने में,
तो सूरज का त्योर चढ़ता है।
ना सोने दे वो मुझको,
प्रातः मुझे उठना पड़ता है।
कैसे तोडूं बंधन उलझन?
इनसे भी जूझना पड़ता है।
-चंद्र दत्त शर्मा
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