विज्ञापन

ना जाने उम्र कब निकल गयी

P R Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कमाने में सारी उम्र निकल गयी
        
                                                    
                            
पता ना चला कब ज़िन्दगी फिसल गयी
बचपन कहता थोड़ा कूदो मौज उड़ाओ
जवानी कहती जब तक दम है
धन दौलत बनाओ
बुढ़ापा कहता सब कुछ छोड़
अब तो आराम पाओ

सुबह हुई काम पर निकले
दिन ढला काम से लौटे
कल अच्छा होगा यही सोच में
हरदम ज़िन्दगी को गंवाते रहे

अपने लिए क्या सोचा था
कुछ याद नहीं रहा
औरों के सपने पूरे करने में
समय बीत जाता था

जब जेब खाली थी दिल भरा था
जब जेब भरी दिल खाली हो गया
घर बनाने में उम्र गुज़ार दी
अपनी ख़ुशी ना जाने कहाँ छूट गयी

कल के भरोसे बैठे थे
आज भी हाथ से निकल गया
माँ चल बसी पापा भी चले गए
जिसके लिए घर छोड़ा था
वो ही ज़िन्दगी से निकल गए
कमाने में गुज़ार दी ज़िन्दगी
ना जाने उम्र कब निकल गयी
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Prem Chandra

2 कविताएं

View Profile

1 कविता

View Profile

1 कविता

View Profile

1 कविता

View Profile

1 कविता

View Profile