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ना जाने उम्र कब निकल गयी

                
                                                         
                            कमाने में सारी उम्र निकल गयी
                                                                 
                            
पता ना चला कब ज़िन्दगी फिसल गयी
बचपन कहता थोड़ा कूदो मौज उड़ाओ
जवानी कहती जब तक दम है
धन दौलत बनाओ
बुढ़ापा कहता सब कुछ छोड़
अब तो आराम पाओ

सुबह हुई काम पर निकले
दिन ढला काम से लौटे
कल अच्छा होगा यही सोच में
हरदम ज़िन्दगी को गंवाते रहे

अपने लिए क्या सोचा था
कुछ याद नहीं रहा
औरों के सपने पूरे करने में
समय बीत जाता था

जब जेब खाली थी दिल भरा था
जब जेब भरी दिल खाली हो गया
घर बनाने में उम्र गुज़ार दी
अपनी ख़ुशी ना जाने कहाँ छूट गयी

कल के भरोसे बैठे थे
आज भी हाथ से निकल गया
माँ चल बसी पापा भी चले गए
जिसके लिए घर छोड़ा था
वो ही ज़िन्दगी से निकल गए
कमाने में गुज़ार दी ज़िन्दगी
ना जाने उम्र कब निकल गयी
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43 मिनट पहले

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