धूल को भी अभिमान हो गया
जब हवा का साथ मिला
उड़ने लगी और आकाश में छा गई
गर्व से कहने लगी देखो जरा
आज मेरे समान कोई नहीं
जल हो या थल, नभ हो या दिशाएँ
जिधर देखो आज बस मैं ही मैं हूं
बादल ने जब देखा धूल को घमंड से सर उठाए
वो अट्टहास करने लगा
उसने जल की बूंदें बरसाईं
फिर क्या था औंधे मुँह
धूल धरा पर आ गिरी
दिशाएं साफ हो गईं
चहुँ ओर सौंदर्य का साम्राज्य छा गया
धरती ने पूछा रेणुके तुमने अपने
उत्थान पतन से क्या सीखा
धूल को पछतावा हुआ
वो बोली उन्नति पा कर
अभिमान नहीं करना चाहिए
अभिमान करनेवाले का पतन सुनिश्चित होता
अतः अभिमान मत करो
चाहे कितनी ऊंचाई पा जाओ